Home Uttarakhand Dehradun थानों गांव में स्थित मस्जिद को सील करना निंदनीय : जमीअत

थानों गांव में स्थित मस्जिद को सील करना निंदनीय : जमीअत

Sealing mosque located in Thano village is condemnable

देहरादून। Sealing mosque located in Thano village is condemnable थानों गांव स्थित मस्जिद को सील किए जाने की कार्रवाई की जमीअत उलेमा-ए-हिन्द उत्तराखण्ड ने कड़े शब्दों में निंदा की है। जमीअत के प्रदेश महासचिव मौलाना शराफत अली कासमी ने कहा कि यह कार्रवाई न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों पर सीधा प्रहार है।

उन्होंने कहा कि जिस मस्जिद का अस्तित्व वर्ष 1985 से है और जिसका एक हिस्सा अल्पसंख्यक कल्याण निधि से सरकारी विभाग द्वारा निर्मित कराया गया हो, उसे अवैध निर्माण बताकर सील करना प्रशासनिक विरोधाभास और गंभीर लापरवाही को उजागर करता है। यदि वास्तव में उक्त निर्माण नियमों के विरुद्ध था तो उस समय निर्माण कराने वाले विभागों और अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

मौलाना कासमी ने सवाल उठाया कि क्या मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण यह स्पष्ट करेगा कि उसके गठन से पूर्व बने सभी भवनों, धार्मिक स्थलों और संस्थानों की भी इसी प्रकार जांच कर उन्हें सील किया जाएगा, अथवा कानून का डंडा केवल चुनिंदा संस्थानों पर ही चलाया जाएगा? यदि नियमों की बात है तो नियम सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए।

उन्होंने कहा कि प्रशासनिक आदेश यदि केवल एक हिस्से तक सीमित था तो पूरे परिसर तथा वहां तक पहुंचने वाले रास्ते को सील करना किस कानून के तहत किया गया? नमाजियों को मस्जिद तक पहुंचने से रोकना और इबादत के अधिकार को बाधित करना अत्यंत गंभीर विषय है। किसी निर्माण विवाद का समाधान धार्मिक गतिविधियों को बंद कराकर नहीं किया जा सकता।

जमीअत उलेमा-ए-हिन्द का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखण्ड में मस्जिदों, मदरसों और मुस्लिम धार्मिक संस्थानों के विरुद्ध जिस प्रकार लगातार कार्रवाई की जा रही है, उससे अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर असुरक्षा और भेदभाव की भावना बढ़ रही है। सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कानून का उपयोग न्याय के लिए हो, किसी समुदाय को भयभीत करने या संदेश देने के लिए नहीं।

मौलाना शराफत अली कासमी ने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और धार्मिक स्थलों पर पूजा-अर्चना एवं इबादत करने की स्वतंत्रता देता है। यदि प्रशासनिक कार्रवाइयों के नाम पर लोगों को मस्जिदों में प्रवेश से रोका जाएगा तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।

उन्होंने कहा कि जमीअत उलेमा-ए-हिन्द इस मामले को उत्तराखण्ड के राज्यपाल, राज्य एवं राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग तथा मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाएगी और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग करेगी। साथ ही यह भी मांग की जाएगी कि मस्जिद को तत्काल खोलकर नमाजियों के आवागमन एवं इबादत के अधिकार को बहाल किया जाए।

मौलाना कासमी ने कहा कि कानून का राज निष्पक्षता से चलता है, शक्ति प्रदर्शन से नहीं। लोकतंत्र की असली पहचान यह है कि वह अपने सबसे कमजोर और सबसे कम सुने जाने वाले नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे। थानों मस्जिद प्रकरण में प्रशासन को अपनी कार्रवाई पर पुनर्विचार करते हुए न्याय, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक सौहार्द को प्राथमिकता देनी चाहिए।

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