प्रसव से पहले ”मौत की सहमति”पर हस्ताक्षर

Signing a "consent to death" before childbirth

उत्तरकाशी/नौगांव। Signing a “consent to death” before childbirth उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले से ऐसी खबर सामने आई है जिसने पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाओं की पूरी तरह पोल पट्टी खोल दी है सोशल मीडिया पर ये पत्र खूब वायरल हो रहा है यहां प्रसव कराने पहुंची महिला के परिवार वालों से प्रसव के दौरान किसी भी अप्रिय घटना यहां तक की मौत की सहमति का एक पत्र लिखवाया गया जिसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

हस्ताक्षर बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीरें आप पहले भी देखते रहे हैं, लेकिन आज जो मामला सामने आया है, वह न सिर्फ सिस्टम को कटघरे में खड़ा करता है बल्कि इंसानियत को भी झकझोर देता है।मामला उत्तरकाशी जनपद के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नौगांव का है, जहां एक स्थानीय व्यक्ति जब अपनी गर्भवती पत्नी को लेकर अस्पताल पहुंचा, तो इलाज से पहले उससे एक ऐसा पत्र लिखवाया गया जिसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।इस पत्र में साफ लिखा गया कि अस्पताल में कोई विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है, न ब्लड बैंक की सुविधा है और न ही ऑपरेशन की व्यवस्था।

गर्भवती महिला के प्रसव के दौरान होने वाले तमाम खतरों, यहां तक कि मां और बच्चे की मौत की संभावना से परिजन को अवगत कराया गया और इसके बावजूद सीमित संसाधनों में प्रसव कराने की सहमति लिखवाई गई।इतना ही नहीं, पत्र में यह भी दर्ज कराया गया कि किसी भी अप्रिय घटना के लिए अस्पताल प्रबंधन या कर्मचारी जिम्मेदार नहीं होंगे, बल्कि सारी जिम्मेदारी परिजन की होगी।

अस्पताल प्रबंधन द्वारा ऐसा पत्र लिखवाया जाना न सिर्फ पहाड़ के गरीब और लाचार लोगों के साथ क्रूर मजाक है, बल्कि यह सिस्टम की जिम्मेदारियों से खुली बचने की कोशिश भी दिखाता है। सवाल यह भी है कि जब सुविधाएं नहीं हैं, तो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र केवल नाम के लिए क्यों?

पाशा के प्रश्न के हाथ लगे इस पत्र ने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। यह तस्वीर केवल नौगांव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की नहीं है, बल्कि पहाड़ के लगभग हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की हकीकत बयां करती है।कुछ दिन पहले कुमाऊं मंडल के चौखुटिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को लेकर स्थानीय लोगों का आक्रोश सड़क पर दिखा। लोग चौखुटिया से पैदल देहरादून तक पहुंचे, लेकिन इसके बावजूद पहाड़ की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई ठोस सुधार नजर नहीं आया।

उत्तराखंड बने 26 साल हो चुके हैं। इस दौरान कई स्वास्थ्य मंत्री आए और गए, लेकिन पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था आज भी रेफर सिस्टम बनकर रह गई है। सीमांत जनपद ही नहीं, बल्कि राजधानी के आसपास के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत भी कुछ अलग नहीं है।कई बार इन केंद्रों में गर्भवती महिलाओं की मौत के आंकड़े डराने वाले रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारी तय करने की बजाय सिस्टम चुप्पी साध लेता है।

इस पूरे मामले में सीएमओ उत्तरकाशी डॉ बी एस रावत ने बताया कि परिवार वालों से कंसर्न फॉर्म भरवाया जाता है इसके अलावा वो कोई और जवाब देने से बचते नज़र आए साथ ही मामले की जानकारी करने की बात उन्होंने कही है।

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