क्या कांग्रेस में फिर बढ़ रहा है ‘सिर फुटव्वल’?

Is infighting escalating in the Congress again?

देहरादून। Is infighting escalating in the Congress again? पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस हरीश रावत की यात्रा को लेकर विवाद ने कांग्रेस के सामने पुराना सवाल फिर खड़ा कर दिया है, क्या चुनाव से पहले पार्टी अपने वरिष्ठ नेताओं को एक मंच पर रख पाएगी? एक तरफ प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व चुनावी तैयारियों को संगठनात्मक ढांचे के तहत आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ हरीश रावत लगातार अलग-अलग क्षेत्रों में जनता और कार्यकर्ताओं से संवाद कर रहे हैं। पार्टी प्रभारी की आपत्ति के बाद भी यात्रा जारी रहने से यह सवाल और गहरा गया है कि आखिर प्रदेश कांग्रेस में फैसलों और कार्यक्रमों को लेकर अंतिम समन्वय की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

हालांकि, रावत का कहना है कि उनकी यात्रा पार्टी के खिलाफ नहीं है। वह खुद को कांग्रेस का सिपाही बताते हुए पार्टी को मजबूत करने की बात कर रहे हैं। ऐसे में पूरे विवाद का केंद्र रावत की राजनीतिक मंशा से अधिक संगठन के साथ कार्यक्रमों के समन्वय का मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर पार्टी प्रदेश नेतृत्व से लेकर हाईकमान तक नाराजगी सामने आई है। प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने रावत को पत्र लिखकर यात्रा और समानांतर कार्यक्रमों को आगे नहीं बढ़ाने की सलाह दी थी। इसके बावजूद सोमवार को रावत ने जसपुर से कुमाऊं में यात्रा शुरू कर दी।
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने हरीश रावत को दिल्ली तलब किया है। बताया जा रहा है कि 7 अक्टूबर को हरीश रावत पार्टी आलाकमान से मुलाकात करने को दिल्ली जा सकते हैं।

उत्तराखंड प्रभारी कुमारी सैलजा ने एक अक्तूबर को हरीश रावत को पत्र भेज का कहा था, कि प्रदेश कांग्रेस के समानांतर कोई कार्यक्रम पार्टी के हित में नहीं होगा। उन्होंने रावत से ऐसे कार्यक्रमों को आगे नहीं बढ़ाने को कहा था। इसके बावजूद सोमवार से रावत ने जसपुर से यात्रा शुरू कर दी है, उनके साथ चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह, कई विधायक और पूर्व स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल भी यात्रा में शामिल हैं।

हरीश रावत की मौजूदा सक्रियता को लेकर चर्चा सितंबर में मंगलौर दौरे के बाद तेज हुई थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 20-21 सितंबर के आसपास मंगलौर में स्वागत के बाद रावत के सोशल मीडिया अकाउंट से ‘बदलाव’ से जुड़ी पोस्ट सामने आई थी। पोस्ट में मंगलौर में बदलाव की बात कही गई थी। बाद में पोस्ट के शब्दों में बदलाव किए जाने अथवा पोस्ट हटाए जाने की बात भी सामने आई। यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर यह सवाल भी उठने लगा कि रावत की लगातार क्षेत्रीय यात्राएं और स्वागत कार्यक्रम केवल जनसंपर्क अभियान हैं या इनके पीछे 2027 के चुनाव को लेकर कोई व्यापक राजनीतिक संदेश भी है।

2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस ने उत्तराखंड में संगठनात्मक समीकरण बदलने की कोशिश की है। गणेश गोदियाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं, जबकि प्रीतम सिंह को चुनाव अभियान समिति और हरक सिंह रावत को चुनाव प्रबंधन समिति की जिम्मेदारी दी गई है। ऐसे में हरीश रावत की लगातार राजनीतिक सक्रियता को पार्टी के भीतर उनके प्रभाव और आगामी चुनावी भूमिका से जोड़कर भी देखा जा रहा है। हालांकि, किसी नेता की भविष्य की भूमिका या मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर अभी कोई आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है।

हरीश रावत को दिल्ली बुलाए जाने की खबरों के बाद अब निगाहें कांग्रेस हाईकमान और रावत के बीच होने वाली बातचीत पर हैं। सवाल यह है कि हाईकमान उनकी यात्रा को लेकर उठी आपत्ति को किस तरह देखता है और रावत संगठन के निर्देशों के साथ अपने कार्यक्रमों का किस तरह समन्वय करते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर एकजुट चुनावी रणनीति बना पाएगी, या फिर नेताओं के अलग-अलग राजनीतिक कार्यक्रम और संदेश पार्टी के भीतर सिर फुटव्वल की चर्चाओं को और हवा देंगे?

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