45 दिनों में 23 मुस्लिम धार्मिक स्थलों पर चला बुलडोजर

Bulldozers used on 23 Muslim religious sites in 45 days

नई दिल्ली। Bulldozers used on 23 Muslim religious sites in 45 days देश के विभिन्न भाजपा शासित राज्यों में पिछले लगभग डेढ़ महीने के दौरान मस्जिदों, दरगाहों, ईदगाहों और मदरसों पर हुई ध्वस्तीकरण कार्रवाइयों ने एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। मई 2026 से जून 2026 के बीच कम से कम 23 मुस्लिम धार्मिक स्थलों को प्रशासनिक कार्रवाई के तहत हटाया या ध्वस्त किया गया है। इनमें सदियों पुरानी मस्जिदें, ऐतिहासिक दरगाहें और धार्मिक शिक्षण संस्थान शामिल हैं।

इन कार्रवाइयों को लेकर प्रशासन का पक्ष है कि सभी अभियान अतिक्रमण हटाने, सड़क चौड़ीकरण, रेलवे विस्तार, शहरी विकास तथा सरकारी भूमि को मुक्त कराने के उद्देश्य से चलाए गए। दूसरी ओर मुस्लिम संगठनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि कई मामलों में पर्याप्त नोटिस नहीं दिए गए तथा कानूनी प्रक्रिया और धार्मिक संवेदनशीलताओं की अनदेखी की गई।

मई माह में दिल्ली के मंगोलपुरी क्षेत्र स्थित लगभग 200 वर्ष पुरानी मानी जाने वाली पंच पीरान दरगाह के एक हिस्से को दिल्ली विकास प्राधिकरण ने ध्वस्त कर दिया। इसके कुछ ही दिनों बाद पीतमपुरा में एक कथित अवैध मदरसे की दीवार भाजपा विधायक कर्नैल सिंह और उनके समर्थकों द्वारा गिराए जाने का मामला भी चर्चा में रहा।

29 मई को हरियाणा के फरीदाबाद स्थित मस्जिद चौक की लगभग 50 वर्ष पुरानी मस्जिद को क्षेत्रीय रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) परियोजना के लिए हटाया गया। अगले ही दिन मुंबई के बांद्रा क्षेत्र में दो मस्जिदों पर बुलडोजर कार्रवाई हुई, जिसके बाद स्थानीय लोगों और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो गई।

जून के पहले सप्ताह में मुंबई के गोरेगांव स्थित 70 वर्ष पुरानी दरगाह और पुणे के बोपोडी क्षेत्र में लगभग 100 वर्ष पुरानी हज़रत शम्सुद्दीन कादरी दरगाह को भी ध्वस्त कर दिया गया। इन घटनाओं के बाद विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं।

1 जून को गुजरात में तीन दरगाहों और एक मुस्लिम कब्रिस्तान को हटाने की कार्रवाई ने व्यापक चर्चा को जन्म दिया। सामाजिक संगठनों का कहना है कि धार्मिक और दफन स्थलों से जुड़े मामलों में प्रशासन को अतिरिक्त संवेदनशीलता बरतनी चाहिए।

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में जून माह के दौरान कई धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई हुई। बघाऊ गांव की एक प्राचीन दरगाह, मस्जिद मुस्तफा कादरी तथा एक ईदगाह परिसर को प्रशासन ने अतिक्रमण बताकर हटाया। मस्जिद मुस्तफा कादरी मामले में “आई लव मुहम्मद” लिखे पोस्टरों और धार्मिक झंडों को लेकर दर्ज मुकदमे ने विवाद को और गहरा कर दिया।

वाराणसी में रेलवे स्टेशन विस्तार परियोजना के तहत अजगैब शहीद मस्जिद को ध्वस्त किया गया, जबकि ऐतिहासिक मस्जिद गंज शहीदा को रेलवे प्रशासन ने खाली करने का नोटिस जारी किया है। मस्जिद प्रबंधन का दावा है कि यह इबादतगाह सदियों पुरानी है और रेलवे स्टेशन के निर्माण से भी पहले से अस्तित्व में है।

राजस्थान की राजधानी जयपुर में नूरानी मस्जिद को सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत ध्वस्त किया गया। वहीं बाड़मेर जिले में 18 जून को चार मस्जिदों को हटाने की कार्रवाई की गई। स्थानीय मुस्लिम समुदाय का कहना है कि मामले न्यायिक प्रक्रिया में होने के बावजूद जल्दबाजी में कार्रवाई की गई।

उत्तराखंड में विगत 2 वर्षों के दौरान 500 से अधिक मजारों को ध्वस्त किया गया हैं। 1 मार्च 2025 से लेकर 1 जून 2026 तक 237 मदरसों मस्जिदों को सील किया गया है। यहां भी तारीखी मस्जिदों को निशाना बनाया गया है।

इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है। अमेरिका स्थित मानवाधिकार संगठन “जस्टिस फॉर ऑल” ने हालिया ध्वस्तीकरण अभियानों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित की जानी चाहिए। संगठन ने भारत के नागरिक समाज और बुद्धिजीवियों से इस विषय पर गंभीर संवाद की अपील की है।

लगातार हो रही इन कार्रवाइयों ने देश में धार्मिक विरासत के संरक्षण, संवैधानिक अधिकारों, प्रशासनिक पारदर्शिता और विधिक प्रक्रिया के पालन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सरकार और प्रशासन इन अभियानों को कानूनसम्मत बताते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में विशेष सावधानी, निष्पक्षता और संवाद की आवश्यकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि विकास परियोजनाओं और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के साथ-साथ धार्मिक भावनाओं, ऐतिहासिक विरासत और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

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