लूट की दोषी का धर्म!

Shahikala

त्वरित टिप्पणी/ डॉ. प्रभात ओझा
वी शशिकला को आय के ज्ञात स्रोत से अधिक सम्पति रखने के मामले में सजा होना और इसके साथ छह साल के लिए किसी भी तरह के चुनाव लड़ने से अयोग्य हो जाना देश की राजनीति के लिए कोई बड़ी घटना नहीं मानी जा सकती। ऐसा इसलिए कि यह पहली बार नहीं हुआ है। इस बार सुप्रीप कोर्ट के निर्णय के बाद जो परिणाम आया है, राजनीतिक क्षेत्र में उसकी प्रतिध्वनि यही है कि शशिकला का तमिलनाडु की सीएम बनने का सपना पूरा नहीं हो सका। किसी सदन में बने रहने के खूबसूरत सपने को और दूसरे राजनेता पहले भी गंवा चुके हैं। इनमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव भी शामिल हैं।
फर्क यह है कि लालू प्रसाद मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री बनने के बाद इस हाल में पहुंचे, जबकि शशिकला एमएलए तक निर्वाचित नहीं हो सकीं और चुनाव नहीं लड़ पाने के बदतर हाल में पहुंच गईं। सम्भव है कि दक्षिण, खासकर तमिलनाडु जैसे राज्य में शशिकला के कुछ भावुक शुभचिंतक अपनी कथित नेता के इस हाल पर बहुत दुखी हों। शशिकला के लिए कथित नेता कहने पर भी ऐसे लोगों को आपत्ति हो सकती है। इसके बावजूद यह सच्चाई है कि वह तमिलनाडु की लोकप्रिय राजनीतिज्ञ जयललिता की सहायक और उससे आगे चलकर सिर्फ दोस्त तक ही रही हैं। उन्होंने कभी पंचायत तक का चुनाव नहीं लड़ा जिससे उनकी लोकप्रियता का अंदाज लगया जा सके। अलग बात है कि जयललिता के साथ अपनी दोस्ती के बल पर ही वह उनके आलीशान निवास पोएस गार्डेन की मालकिन और उनकी पार्टी एआइएडीएमके की महासचिव बन गईं।
जयललिता के लोकप्रिय नाम ललितम्मा की तर्ज पर शशिकला भी एक विशेष समूह में चिनम्मा कहलाने लगी थीं। बहरहाल देश की सर्वाच्च न्यायालय से दोषी साबित होने के बाद इस चिनम्मा ने अपनी सखी ललितम्मा के नाम का ही सहारा लेने की कोशिश की है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शशिकला ने भावुकता भरे अंदाज में कहा है कि वह आने वाली परेशानियों को भी सह लेंगी। वह विधायकों से कहते सुनी गईं कि जब-जब अम्मा एवं पार्टी पर संकट के बादल आया, मैंने झेला, मैंने तकलीफ उठाई। मैं इस बार भी तकलीफ सह लूंगी। इसके पहले कि वह सुप्रीट कोर्ट का आदेश मानते हुए सरेंडर करें और जेल जायं, पार्टी विधायकों की बैठक में पन्नीरसेलवम को पार्टी की प्राथमिकता सदस्यता से ही बाहर करा दिया है।
पन्नीरसेलवम के सीएम बने रहने में बाधा खड़ा करने के लिए उन्होंने पलानीसामी को विधानमंडल दल का नया नेता भी चुनवा दिया है। ध्यान रहे कि शशिकला के नेता चुने जाने और इस्तीफे के बाद फिर से सीएम की कुर्सी पर बने रहने की पन्नीरसेलवम की इच्छा के बाद अधिकतर विधायक एक तरह से शशिकला के कब्जे में ही रहे। शशिकला को सजा के बाद तमिलनाडु में हर वक्त कुछ नया होने का सिलसिला अभी चलता रहेगा। राज्य की बागडोर किसके हाथ में हो, बहुत कुछ राज्यपाल के विवेक और विधानसभा में सीएम बनाये गये नेता के बहुमत पर निर्भर करेगा। शशिकला सीएम बनने से रह गईं, पन्नीरसेलवम कार्यवाहक मुख्यमंत्री हैं, अगला मुखिया कौन होगा, इसका इंतजार है। मुख्य सवाल तो यह है कि तमिलनाडु की राजनीति में भावुकता की भूमिका और कितनी दूर तक चलती रहेगी।

देश की सबसे बड़ी अदालत एक महिला को दोषी ठहराती है और वह कहती हैं कि धर्म की जीत होगी। शशिकला जोड़ती हैं कि पहले भी जब-जब अम्मा मुश्किल में आईं धर्म की जीत हुई है। इस वक्त भी मानती हूं कि धर्म की जीत होगी। नहीं पता कि तमिलनाडु में शशिकला के समर्थक उनकी बात को धर्म से कितना जोड़ेंगे। ऐसा इसलिए कि हमारा धर्म बड़ा व्यापक है और उसकी अपने-अपने ढंग से व्याख्या की जाती है। शशिकला की ही मानें तो वे अम्मा यानी जयललिता के साथ जब धर्म के सहगामी होने की दलील देती हैं तो भूल जाती हैं कि जयललिता उस मामले की मुख्य अभियुक्त थीं, जिसमें शशिकला और दो अन्य को सजा हुई है। जयलिला आज नहीं हैं और कोर्ट ने इसी आधार पर न्याय प्रक्रिया से उनका नाम बाहर कर दिया। ऐसे में जयललिता के जुझारूपन और फलस्वरूप उनकी लोकप्रियता का हवाल तो देना तो उचित है, उनके धर्म का नहीं। जयललिता की अपनी पुरानी मुश्किलों से बाहर निकलने में उनके धर्म की भूमिका को सिर्फ उनकी दोस्त शशिकला ही समझ सकती हैं। बाकी तो यही कहेंगे कि सजा पाये व्यक्ति की कुछ इच्छाएं हो सकतीं हैं, श्अपने धर्मश् के नाम पर वह न्याय को कमतर नहीं ठहरा सकता।