An evening in the name of brotherhood
“एक शाम भाईचारे के नाम” कवि सम्मेलन एवं मुशायरा का आयोजन
देहरादून। An evening in the name of brotherhood दून स्थित तस्मिया एकेडमी, 1 इंदर रोड में “एक शाम भाईचारे के नाम” शीर्षक से कवि सम्मेलन एवं मुशायरा आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. एस. फारुक, अध्यक्ष हिमालय वेलनेस देहरादून ने की। मुशायरे में मुख्य अतिथि के रूप में समाजसेवी धनंजय उपाध्याय तथा सय्यद मोहम्मद कासिम की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में प्रेम, सौहार्द और आपसी एकता का संदेश देना था। शायरी और कविता की इस महफ़िल में शहर के प्रतिष्ठित रचनाकारों ने अपने-अपने अंदाज़ में मोहब्बत, इंसानियत और सामाजिक सरोकारों की बात कही।
भाईचारे और एकता का संदेश
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. एस. फारुक ने कहा कि हम सब एक ही मां-बाप की औलाद हैं और देश के विकास के लिए मिल-जुलकर कार्य करना समय की आवश्यकता है। मुख्य अतिथि धनंजय उपाध्याय ने कहा कि आज के व्यक्तिवाद के दौर में भाईचारे की बात करना भी मानो अपराध समझा जाने लगा है, लेकिन आज जो भाईचारे की शमा रोशन हुई है, उससे देश में एकता का उजियारा अवश्य फैलेगा।
केजी बहल ने अपने विचार रखते हुए कहा कि समाज से नफरत मिटाने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिए। सय्यद मोहम्मद कासिम ने कहा कि वर्तमान समय में इस प्रकार की महफ़िलें बेहद आवश्यक हैं, क्योंकि यही आयोजन समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं।
शायरों ने बांधा समां
मुशायरे में शायरों ने अपने कलाम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
असलम खतौलवी ने पढ़ा—
“शजर को काट के पौधे नए बोने की जिद है,
अजब इंसान है, जिसको खुद होने की जिद है।”
बदरुद्दीन ज़िया, देहरादून ने कहा—
“खुश रहा शुक्र-ए-खुदा कर लिया,
मुझको जो कुछ मिला इक्तिफा कर लिया।”
अंबर खरबंदा, देहरादून ने भावपूर्ण अंदाज़ में पढ़ा—
“दर्द के गहरे समुंदर में उतर जाता, तो
मैं अगर तल्खी-ए-हालात से डर जाता, तो
ये मेरे फूल से बच्चे भी तो कुम्हला जाते
मैं जो दिन भर की थकान ओढ़ के घर जाता, तो।”
शादाब मशदी ने शानदार संचालन का दायित्व निभाया।
अंबिका सिंह रूही, देहरादून ने पढ़ा—
“रहगुज़र की तपती रेत सा आतिश-ज़दा हर पल,
तुम हो मुहब्बत का शहर, तुम साथ आ जाओ।”
राजेश आनंद असीर, देहरादून ने भी अपना कलाम प्रस्तुत किया।
शाख़ दूनवी, देहरादून ने कहा—
“जब उनकी जुल्फों को सरे-दीवार जमाल आया था,
तब उन्हें हुस्न को ढकने का ख्याल आया था।”
रईस अहमद “फ़िगार”, देहरादून ने पढ़ा—
“आंख में जो पानी है, दर्द की निशानी है,
आंख की चमक लेकिन सच की पासबानी है।”
“शौहर” जलालाबादी, देहरादून ने व्यंग्य शायरी से श्रोताओं को खूब गुदगुदाया।
ए. एम. इम्तियाज़ कुरैशी, देहरादून ने कहा—
“मेरा उस्ताद कोई एक नहीं,
सारी दुनिया सिखा रही है मुझे।”
सुनील साहिल, देहरादून ने पढ़ा—
“हम अपनी जिंदगी से खुश-बयानी खो चुके हैं,
दुआओं से मुअत्तर जिंदगानी खो चुके हैं।”
दर्द गढ़वाली, देहरादून ने कहा—
“है विरासत में मिली मुझको मुहब्बत,
सो मुहब्बत ही मुहब्बत कर रहा हूं।”
कुमार विजय द्रोणी, देहरादून ने संदेश दिया—
“जमाना बड़ा खराब है, खुद को जरा संभाला करो,
अंधेरा दिलों में बहुत है, मुहब्बत का उजाला करो।”
धनंजय उपाध्याय, देहरादून ने भी अपनी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज कराई।
दीपक कुमार अरोड़ा, देहरादून ने कहा—
“जो अंधेरे से समझौता न करे,
एक ‘दीपक’ और यहां आबाद हो।”
मोनिका मंतशा, देहरादून ने पढ़ा—
“हमें जो बात कहनी हो अलल-ऐलान कहते हैं,
मुनाफिक की तरह अपनों की गीबत हम नहीं करते।”
आयोजकों ने व्यक्त किया आभार
कार्यक्रम के आयोजन में एनएपीएसआर के आरिफ खान, इंसाफ की दस्तक के मोहम्मद शाह नजर तथा बल्ड फेयर के सुमित गर्ग की प्रमुख भूमिका रही। सभी अतिथियों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया गया।
इस अवसर पर एम. एम. मुस्तफा, अफजल ज़मीर बैग, इकराम अंसारी, आर. के. भाख्शी, डॉ. अनवर अहमद, अफसाना सुल्तान, गिरीश पंत, कविता खान, तौसीफ खान, मौलाना अब्दुल वाजिद, सय्यद दानिश, डॉ. असगर अली, अमर सिंह, संजय कुमार, आनंद सिंह सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। यह आयोजन सचमुच भाईचारे, एकता और मोहब्बत के संदेश से ओतप्रोत एक यादगार शाम साबित हुआ।
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