15 दिनों तक छाए रहे ‘हरदा’ अब फिर मैदान में उतरेंगे?

Will ‘Harda’ enter the fray once again?

मौहम्मद शाह नज़र

देहरादून। Will ‘Harda’ enter the fray once again? उत्तराखंड की राजनीति में पिछले 15 दिनों से जिस एक नाम की सबसे ज्यादा चर्चा रही, वो है कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत। ‘अर्जित अवकाश’ के नाम पर सियासी दूरी बनाने वाले हरदा का ‘सियासी अवकाश’ 11 अप्रैल शनिवार को पूरा हो रहा है।

‘अर्जित अवकाश’ के बावजूद हरीश रावत इन 15 दिनों में पूरी तरह सक्रिय रहे। ऐसे में सवाल यही है, क्या ये सिर्फ नाराजगी थी या 2027 चुनाव से पहले की बड़ी सियासी बिसात?

28 मार्च को कांग्रेस में 6 नेताओं की ज्वाइनिंग हुई, लेकिन हरदा के करीबी माने जाने वाले संजय नेगी को जगह नहीं मिली। बस यहीं से सियासी पारा चढ़ गया। नाराज हरदा ने 15 दिन का ‘राजनीतिक अवकाश’ ले लिया और यहीं से शुरू हुआ असली खेल। हालांकि ‘अवकाश’ में भी हरीश रावत फुल एक्टिव रहे, दिन में 10 कार्यक्रम, रात में सोशल मीडिया पर वार राजनीतिक ब्रेक लेने के बावजूद हरीश रावत लगातार जनता के बीच रहे।

राजनीतिक जानकार इसे ‘सोची-समझी रणनीति’ बता रहे हैं। इन 15 दिनों तक हरदा का घर बना सियासी दरबार बना रहा, कांग्रेस सहित कई भाजपा के नेताओं की आमद से सियासी पारा भी चढ़ा। कुछ खुद उनके घर गए, तो कुछ को हरदा ने बुलाया। मुलाकातों का दौर इतना तेज रहा कि सियासी गलियारों में एक ही चर्चा ‘क्या हरदा को साइडलाइन करना आसान है?

इस दौरान पार्टी के भीतर भी हलचल कम नहीं रही, कुछ नेताओं ने खुलकर हरदा का समर्थन किया, तो कुछ ने तंज कसकर माहौल गरमाया। यहां तक कि सामूहिक इस्तीफे की बात भी उठी (हालांकि हुआ नहीं) अपने अवकाश के दौरान हरदा ने सोशल मीडिया पर तीखे शब्दों में लिखा कि अलग-अलग ध्रुवों के लोग एक जैसी भाषा में उन पर हमला कर रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग तो उन्हें ‘कंडाली घास के छपके’ लगाने की सलाह दे रहे हैं, यानि सियासी चुभन अब निजी कटाक्ष तक पहुंच गई।

अब जब हरीश रावत वापस सियासी पिच पर उतर चुके हैं, तो आगे क्या होगाये देखना दिलचस्प होगा। क्या संजय नेगी की एंट्री होगी? क्या कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर खींचतान बढ़ेगी? या हरदा फिर कोई नया सियासी दांव चलेंगे? एक बात साफ है इन 15 दिनों में हरदा ने ये जता दिया कि उत्तराखंड कांग्रेस में उनकी अनदेखी आसान नहीं।

अगर पार्टी ने संतुलन नहीं साधा, तो 2027 के चुनाव में ‘आशा की किरण’ पर सियासी बादल भी छा सकते हैं। कुल मिलाकर, ये ‘अवकाश’ कम और ‘पॉलिटिकल पावर शो’ ज्यादा नजर आया। अब देखना है, हरदा का अगला कदम कांग्रेस को मजबूती देगा या नई सियासी खींचतान को जन्म देगा।