order to make Vande Mataram compulsory is highly biased
यह देश की अल्पसंख्यकों से संविधान द्वारा दी गई धार्मिक स्वतंत्रता छीनने की साजिश: मदनी
नई दिल्ली। order to make Vande Mataram compulsory is highly biased वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य महत्वपूर्ण आयोजनों में इसके सभी अंशों की धुन बजाने और पढ़ने को अनिवार्य घोषित किए जाने के संबंध में केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना को अत्यंत दुखद तथा नागरिकों पर जबरन थोपा गया निर्णय बताते हुए जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह न केवल एक पक्षपातपूर्ण फैसला है बल्कि नागरिकों की उस धार्मिक स्वतंत्रता पर गहरी चोट करने का प्रयास है जो देश के संविधान ने उन्हें प्रदान की है। उन्होंने कहा कि अब यह दुखद सच्चाई पूरी तरह सामने आ गई है कि इन लोगों को देश की प्रगति और जनता की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है, वे हर समय चुनावी मोड में रहते हैं। उनका हर काम और हर फैसला इस बात पर निर्भर करता है कि उससे चुनाव में कितना लाभ मिल सकता है।
मौलाना मदनी ने कहा कि वंदे मातरम् का विवाद बहुत पुराना है। इससे पहले दिसंबर 2025 में जब इसे लेकर संसद में चर्चा हुई थी तब भी हमने अपने एक बयान के माध्यम से अपना रुख स्पष्ट कर दिया था। हमें किसी के वंदे मातरम् गाने या किसी समारोह में इसकी धुन बजाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन हम मुसलमान इस गीत को इसलिए नहीं गा सकते क्योंकि हम केवल एक अल्लाह की इबादत करते हैं और अपनी इस इबादत में किसी और को शामिल नहीं कर सकते।
उन्होंने यह भी कहा कि वंदे मातरम् की विषयवस्तु शिर्क से संबंधित मान्यताओं पर आधारित है और इसके एक अंतरे में देश को दुर्गा माता से उपमा देकर उसकी उपासना के लिए शब्दों का प्रयोग किया गया है। हर धर्म के अपने आदेश और नियम होते हैं जिन पर अमल करने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता और इसी कारण हमारे संविधान में भी अनुच्छेद 25 के तहत प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता दी गई है। ऐसे में किसी विशेष नागरिक या नागरिकों पर किसी विशेष विचारधारा को अपनाने, उसका उच्चारण करने या उसे मानने के लिए मजबूर करना संविधान के प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन है।
मौलाना मदनी ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट का भी यह निर्णय है कि किसी भी नागरिक को राष्ट्रगान या किसी ऐसे गीत को गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जो उसके धार्मिक विश्वास के विरुद्ध हो। उन्होंने कहा कि देश से प्रेम एक अलग बात है और उसकी पूजा दूसरी बात। मुसलमानों को इस देश से कितनी मोहब्बत है, इसके लिए उन्हें किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों और जमीयत उलमा-ए-हिंद के बुजुर्गों की बेमिसाल कुर्बानियाँ और विशेष रूप से देश के विभाजन के विरोध में जमीयत की कोशिशें दिन के उजाले की तरह स्पष्ट हैं। आज़ादी के बाद भी देश की एकता और अखंडता के लिए उनकी जद्दोजहद को भुलाया नहीं जा सकता। हमने हमेशा कहा है कि देशभक्ति का संबंध दिल की निष्ठा और कर्म से है, न कि नारों से।
आजादी से पहले का ऐतिहासिक रिकॉर्ड मौजूद है कि 26 अक्टूबर 1937 को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र में सलाह दी थी कि वंदे मातरम् के प्रारंभिक दो बंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए क्योंकि शेष पंक्तियाँ एकेश्वरवादी धर्मों की मान्यताओं से टकराती हैं। फलस्वरूप 19 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस की वर्किंग कमेटी ने निर्णय लिया कि इसके केवल दो बंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए।
संसद में हुई पूरे दिन की चर्चा में भी कांग्रेस सहित अन्य दलों के सदस्यों ने इसी बात पर जोर दिया था, लेकिन अब एक आदेश के माध्यम से पूरे गीत को नागरिकों पर थोपने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके पीछे देशभक्ति की भावना नहीं बल्कि राजनीति काम कर रही है। वर्तमान सरकार जब भी किसी मुद्दे पर घिरती है तो जानबूझकर कोई न कोई विवाद खड़ा करने की कोशिश करती है ताकि जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हटाया जा सके, वंदे मातरम् संबंधी अधिसूचना इसका ताज़ा उदाहरण है।
उन्होंने अंत में कहा कि यह देश को बाँटने वाली राजनीति है। हर हाल में सत्ता बनाए रखने का यह जुनून देश की शांति और एकता को नष्ट करने वाला ही नहीं है बल्कि उस संविधान को भी पैरों तले रौंदता है जिस पर हमारे देश के महान लोकतंत्र की नींव टिकी हुई है।
जरा इसे भी पढ़े
बंगला देश में जो कुछ हुआ वह क्रूरता की पराकाष्ठा है, इसकी जितनी निंदा की जाए कम : मौलाना अरशद मदनी
मोहब्बत व भाईचारे से इंसानियत का पैगाम दीजिए : अरशद मदनी
यूसीसी विधेयक : मदनी ने कहा शरीयत के बाहर कोई कानून मंजूर नहीं











