Hate Speech Events in India 2025
- नफरती भाषण देने में पाया देश में पहला स्थान
- पुष्कर सिंह धामी ने प्रवीण तोगड़िया को पछाड़ा
- भारत में वर्ष 2025 के दौरान मुस्लिम और ईसाई समुदाय के खिलाफ 1,318 नफरत भरे भाषण के मामले आए सामने
नई दिल्ली। Hate Speech Events in India 2025 वॉशिंगटन डी.सी. (13 जनवरी, 2026) – इंडिया हेट लैब (आई एच एल ), जो कि सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज़्ड हेट (सीएसओ एच) की एक परियोजना है, ने अपनी वर्ष 2025 की वार्षिक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत के 21 राज्यों, एक केंद्र शासित प्रदेश और दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) में धार्मिक अल्पसंख्यकों—मुख्य रूप से मुसलमानों और ईसाइयों—के खिलाफ 1,318 प्रत्यक्ष (इन-पर्सन) नफरत भरे भाषण दर्ज किए गए।
यह संख्या वर्ष 2024 की तुलना में 13 प्रतिशत अधिक और वर्ष 2023 की तुलना में 97 प्रतिशत अधिक है। वर्ष 2023 में ऐसे 668 मामले दर्ज किए गए थे। रिपोर्ट में नफरत भरे भाषणों को संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार वर्गीकृत किया गया है। इनमें षड्यंत्र सिद्धांत, हिंसा और हथियार उठाने की अपील, सामाजिक व आर्थिक बहिष्कार के आह्वान, पूजा स्थलों को कब्जे में लेने या नष्ट करने की मांग, अमानवीय भाषा तथा भारत में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को निशाना बनाने वाले भाषण शामिल हैं।
कुल 1,289 भाषण (98 प्रतिशत) मुसलमानों के खिलाफ थे—इनमें 1,156 मामले सीधे तौर पर और 133 मामले मुसलमानों के साथ-साथ ईसाइयों को भी निशाना बनाने वाले थे। यह आंकड़ा 2024 की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। ईसाई समुदाय के खिलाफ 162 नफरत भरे भाषण दर्ज किए गए, जो कुल घटनाओं का 12 प्रतिशत है। इनमें 29 मामले सीधे तौर पर और 133 मामले मुसलमानों के साथ संयुक्त रूप से थे। यह संख्या 2024 में दर्ज 115 मामलों की तुलना में 41 प्रतिशत अधिक है।
रिपोर्ट के अनुसार, कुल घटनाओं में से लगभग 88 प्रतिशत (1,164 मामले) उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुए, जहां भाजपा, भाजपा-नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) या भाजपा-प्रशासित केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार थी। यह 2024 में दर्ज 931 मामलों की तुलना में 25 प्रतिशत की वृद्धि है, जो भाजपा के शासन वाले क्षेत्रों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत भरे भाषणों की भारी सघनता को दर्शाता है।
23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विश्लेषण में पाया गया कि वर्ष के अधिकांश समय 16 स्थानों पर भाजपा या उसके सहयोगी दल सत्ता में थे। नफरत भरे भाषणों के सर्वाधिक मामले उत्तर प्रदेश (266), महाराष्ट्र (193), मध्य प्रदेश (172), उत्तराखंड (155) और दिल्ली (76) में दर्ज किए गए। ये पाँचों मिलकर देशभर की कुल घटनाओं का 65 प्रतिशत हिस्सा हैं। इसके विपरीत, विपक्षी दलों या गठबंधन द्वारा शासित सात राज्यों में वर्ष 2025 में केवल 154 घटनाएं दर्ज की गईं, जो 2024 की तुलना में 34 प्रतिशत कम हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बजरंग दल सबसे अधिक नफरत भरे भाषणों के आयोजक के रूप में सामने आए, जिनसे जुड़े 289 मामले (22 प्रतिशत) थे। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद (AHP) रही, जिससे जुड़े 138 मामले दर्ज हुए। कुल मिलाकर, वर्ष 2025 में 160 से अधिक संगठनों और अनौपचारिक समूहों की पहचान नफरत भरे भाषणों के आयोजक या सह-आयोजक के रूप में की गई।
व्यक्तिगत रूप से, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सबसे अधिक नफरत भरे भाषण देने वाले व्यक्ति के रूप में सामने आए, जिनके 71 भाषण दर्ज किए गए। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के प्रमुख प्रवीण तोगड़िया (46) और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय (35) का स्थान रहा। हिंदू साधु-संतों और धार्मिक नेताओं की भूमिका भी उल्लेखनीय रही—वे 145 घटनाओं में शामिल पाए गए, जो 2024 की तुलना में 27 प्रतिशत अधिक है।
रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2025 में दर्ज लगभग आधे भाषणों (656 मामले) में “लव जिहाद”, “लैंड जिहाद” और “पॉपुलेशन जिहाद” जैसे षड्यंत्र सिद्धांतों का इस्तेमाल किया गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 13 प्रतिशत की वृद्धि है। वहीं, 308 भाषणों में हिंसा की खुली अपील की गई, जिनमें से 136 में सीधे तौर पर हथियार उठाने का आह्वान था—यह हिंसक बयानबाज़ी में 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाता है।
महाराष्ट्र में सबसे अधिक खतरनाक भाषण दर्ज किए गए—कुल 78 मामले, जिनमें से लगभग 40 प्रतिशत में हिंसा की अपील शामिल थी। इसके अलावा, 120 भाषणों में अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर मुसलमानों, के बहिष्कार की बात कही गई, जबकि 276 भाषणों में मस्जिदों, दरगाहों और चर्चों को हटाने या नष्ट करने की मांग की गई। उत्तर प्रदेश की ज्ञानवापी मस्जिद और शाही ईदगाह मस्जिद सबसे अधिक निशाने पर रहीं, जो जमीनी स्तर पर संभावित लामबंदी की ओर इशारा करता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 141 भाषणों में अमानवीय भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिनमें अल्पसंख्यकों को “दीमक”, “परजीवी”, “कीड़े”, “सूअर”, “पागल कुत्ते”, “सांप के बच्चे”, “हरे सांप” और “खून के प्यासे ज़ॉम्बी” जैसे शब्दों से संबोधित किया गया।
कुल 1,318 घटनाओं में से 1,278 घटनाओं के वीडियो सबसे पहले या तो साझा किए गए या सोशल मीडिया पर लाइव-स्ट्रीम किए गए। इनमें फेसबुक पर 942, यूट्यूब पर 246, इंस्टाग्राम पर 67 और एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर 23 वीडियो सबसे पहले अपलोड किए गए, जो नफरत फैलाने में सोशल मीडिया की केंद्रीय भूमिका को दर्शाता है।
CSOH की रिसर्च डायरेक्टर डॉ. एवियाने लीडिग ने कहा, “आंकड़े दिखाते हैं कि जहां घरेलू और अंतरराष्ट्रीय घटनाएं नफरत भरे भाषणों में अस्थायी उछाल का कारण बनती रहीं, वहीं सबसे चिंताजनक प्रवृत्ति पूरे वर्ष एक ऊंचे स्तर पर इसकी निरंतरता रही। पिछले वर्षों के विपरीत, 2025 में चुनावी दौर के बाहर भी नफरत भरे भाषण कम नहीं हुए, जो प्रतिक्रियात्मक नहीं बल्कि रणनीतिक बदलाव की ओर इशारा करता है।”
CSOH के कार्यकारी निदेशक राक़िब हमीद नाइक ने कहा, “2024 में चुनावी दौर के दौरान भाजपा की खुली सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति वह निर्णायक जनादेश नहीं दिला सकी, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी। इसके बाद रणनीति में बदलाव देखा गया, न कि उसका परित्याग। हमारे आंकड़े दर्शाते हैं कि RSS-नेतृत्व वाले पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर हिंदू राष्ट्रवादी समूहों द्वारा दीर्घकालिक, विकेंद्रीकृत और ज़मीनी स्तर की लामबंदी की ओर रुख किया गया है। इसका उद्देश्य आने वाले राज्य चुनावों और 2029 के आम चुनावों से पहले राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करना है।”
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